जय हनुमान ज्ञान गुन सागर:
हनुमान पंचक
🚩 रचनाकार: महाकवि श्री चतुरसिंह
हनुमान पंचक, महाकवि श्री चतुरसिंह जी द्वारा रचित एक ऐसी स्तुति है जो प्रभु हनुमान के अद्भुत पराक्रम, बल और भक्तवत्सलता का जीवंत चित्रण करती है। चतुरसिंह जी, जिन्हें 'मेवाड़ के मीरा' के रूप में भी जाना जाता है, हिन्दी, संस्कृत, और राजस्थानी जैसी भाषाओं के एक महान मर्मज्ञ विद्वान थे। उनकी रचनाएं हृदय को छू लेने वाली और दर्शन से भरी होती हैं।
यह पंचक स्तुति वीर हनुमान जी की शक्ति को समर्पित है, जिसके पाठ मात्र से ही सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। आज भी उनकी मेवाड़ी रचनाएँ मेवाड़ के कोने-कोने में, हर घर में प्रेम और श्रद्धा से गाई जाती हैं। आइए, उनकी इसी अद्वितीय भक्तिमय प्रस्तुति, 'हनुमान पंचक' का पाठ करें और बल, बुद्धि तथा विद्या के सागर, पवनपुत्र का आशीर्वाद प्राप्त करें।
🙏 हनुमान पंचक स्तोत्र
बालि सहोदर पालि लयो हरि कालि पतालिहु डालि दई है। भालि मरालिसि सीय करालि बिडालि निषालि बिहालि भई है।। डालि डरालि महालिय राय गजालिन चालि चपेट लई है। ख्यालिहिं षालि दई गंध कालि कपाल उत्तालि बहालि गई है। ।2।।
आसुविभावसु पासु गए अरू तांसु सुहासु गरासु धरयो है। अच्छ सुबच्छन तच्छन तोरि स रच्छन पच्छन पच्छ कर्यो है।। आर अपार कु कार पछार समीर कुमार भर्यो हैं। को हनुमान् समान जहान बखानत आज अमान भर्यो है।।3।।
अंजनि को सुत भंजन भीरन सज्जन रंजन पंज रहा है। रूद्र समुद्रहि धुद्र कियो पुनि क्रुद्ध रसाधर ऊर्द्ध लहा है।। मोहिन ओप कहो पतऊ तुब जोप दया करू तोप कहा है। गथ्थ अकथ्थ बनत्त कहा हनुमत्त तु हथ्थ समथ्थ सहा है।।4।।
भान प्रभानन कै अनुमान गए असमान बिहान निहारी। खान लग मधवानहु को सुकियो अपमान गुमानहिं गारी।। प्राण परान लगे लच्छमानतु आनन गानपती गिरधारी। बान निवाय सुजान महानसु है हनुमान् करान हमारी।।5।।
दोहाः- बसुदिषि औं पौराण दष्ण इक इक आधे आन। सित नवमी इश इंदु दिन पंचक जन्म जहान।।
इस पावन 'हनुमान पंचक' के पाठ से आपके जीवन में बल, बुद्धि और भक्ति का संचार हो। प्रभु हनुमान आपकी सभी बाधाओं को दूर कर आपको सुखी और समृद्ध करें।
