दुर्गा सप्तशती द्वितीय अध्याय । Duraga Sapatshati

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दुर्गा सप्तशती द्वितीय अध्याय(AI द्वारा निर्मिती इमेज)
श्रीदुर्गासप्तशती - द्वितीयोऽध्याय: (महिषासुर सैन्य वध) - संपूर्ण पाठ और हिंदी अर्थ

अथ श्रीदुर्गासप्तशती

द्वितीयोऽध्याय: (महिषासुरसैन्यवधो नाम)

मध्यमचरित्र

ध्यानम्

ॐ अक्षस्रक्‌परशुं गदेषुकुलिशं पद्‌मं धनुष्कुण्डिकां दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम् ।
शूल पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तै: प्रसन्नाननां सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम् ॥

**हिंदी अर्थ:** मैं उस महालक्ष्मी देवी की सेवा (ध्यान) करता हूँ, जो कमल पर विराजमान हैं, और जिनकी मुद्रा प्रसन्न है। उन्होंने अपने हाथों में अक्षमाला, परशु (फरसा), गदा, बाण, वज्र (कुलिश), पद्म (कमल), धनुष, कुण्डिका (कमंडलु), दण्ड, शक्ति, असि (तलवार), चर्म (ढाल), जलज (शंख), घण्टा, सुराभाजन (मदिरा पात्र), शूल (त्रिशूल), पाश और सुदर्शन (चक्र) धारण किए हुए हैं। ये ही महिषासुर का मर्दन करने वाली हैं।

'ॐ र्‍हिं' ऋषिरुवाच ॥१॥

देवासुरमभुद्युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा ।
महिषेऽसुराणामधिपे देवानां च पुरन्दरे ॥२॥
तत्रासुरैर्महावीर्यैर्देवसैन्यं पराजितम् ।
जित्वा च सकलान् देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुर: ॥३॥

**हिंदी अर्थ:** ऋषि बोले: प्राचीन काल में, महिषासुर के असुरों का राजा होने पर और इंद्र के देवताओं के राजा होने पर, देवताओं और असुरों के बीच सौ वर्ष तक भीषण युद्ध हुआ। (2) उस युद्ध में महावीर्य असुरों द्वारा देवताओं की सेना पराजित हो गई। (3) सभी देवताओं को जीतकर महिषासुर (स्वयं) इंद्र बन गया।

तत: पराजिता देवा: पद्‌मयोनिं प्रजापतिम् ।
पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेशगरुडध्वजौ ॥४॥
यथावृत्तं तयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम् ।
त्रिदशा: कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम् ॥५॥

**हिंदी अर्थ:** तब पराजित देवता ब्रह्मा (पद्मयोनि प्रजापति) को आगे करके वहाँ गए जहाँ शिव (ईश) और गरुड़ध्वज (विष्णु) विराजमान थे। (4) देवताओं ने उनसे महिषासुर के सारे कुकृत्य और अपने पराजय का विस्तृत वृत्तान्त कह सुनाया। (5)

सूर्येन्द्राग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य च ।
अन्येषां चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठति ॥६॥
स्वर्गान्निराकृता: सर्वे तेन देवगणा भुवि ।
विचरन्ति यथा मर्त्या महिषेण दुरात्मना ॥७॥

**हिंदी अर्थ:** (उन्होंने बताया कि) वह महिषासुर सूर्य, इंद्र, अग्नि, अनिल (वायु), इंदु (चंद्रमा), यम और वरुण के तथा अन्य देवताओं के अधिकारों पर स्वयं ही अधिकार जमा कर बैठा है। (6) उस दुरात्मा महिषासुर के कारण स्वर्ग से निकाले गए सभी देवगण पृथ्वी पर मनुष्यों की तरह विचरण कर रहे हैं। (7)

एतद्व: कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम् ।
शरणं व: प्रपन्ना: स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम् ॥८॥

**हिंदी अर्थ:** "हमने आपको अमरों के शत्रु (असुर) महिषासुर के सारे कार्य बता दिए हैं। हम सब आपकी शरण में आए हैं, अब उसके वध के विषय में विचार कीजिए।" (8)

इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदन: ।
चकार कोपं शम्भुश्र्च भ्रुकुटीकुटिलाननौ ॥९॥
ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्तत: ।
निश्‍चक्राम महत्तेजो ब्रह्मण: शंकरस्य च ॥१०॥

**हिंदी अर्थ:** देवताओं के ये वचन सुनकर मधुसूदन (विष्णु) और शंभु (शिव) ने क्रोध किया, जिससे उनकी भृकुटियाँ टेढ़ी हो गयीं और मुखमंडल विकृत हो गया। (9) तब अत्यंत क्रोध से भरे हुए चक्रधारी (विष्णु) के मुख से एक महान तेज निकला, और ब्रह्मा तथा शंकर (शिव) के शरीर से भी तेज निकला। (10)

अन्येषं चैव देवानां शक्रादीनां शरीरत: ।
निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत ॥११॥
अतीव तेजस: कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम् ।
ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम् ॥१२॥

**हिंदी अर्थ:** इंद्र आदि अन्य देवताओं के शरीर से भी एक बहुत बड़ा तेज निकला और वह सब एक (एकत्र) हो गया। (11) देवताओं ने वहाँ उस तेज के पुंज को देखा, जो जलते हुए पर्वत के समान था और उसकी ज्वालाएँ दिशाओं को व्याप्त कर रही थीं। (12)

अतुलं तत्र तत्तेज: सर्वदेवशरीरजम्।
एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥१३॥
यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम् ।
याम्येन चाभवन् केशा बाहवो विष्णुतेजसा ॥१४॥

**हिंदी अर्थ:** सभी देवताओं के शरीर से उत्पन्न वह अतुलनीय तेज एक जगह इकट्ठा होकर एक **नारी** में परिवर्तित हो गया, जिसकी कान्ति से तीनों लोक व्याप्त हो गये। (13) जो शिव (शाम्भव) का तेज था, उससे उस देवी का **मुख** बना; यम के तेज से **केश** बने, और विष्णु के तेज से **बाहें** बनीं। (14)

सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत् ।
वारुणेन च जङ्‍घोरू नितम्बस्तेजसा भुव: ॥१५॥
ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्‌गुल्योऽर्कतेजसा ।
वसूनां च कराङ्‌गुल्य: कौबेरेण च नासिका ॥१६॥

**हिंदी अर्थ:** सोम (चन्द्रमा) के तेज से स्तनों का जोड़ा, और इंद्र के तेज से **मध्य भाग** (कमर) बना। वरुण के तेज से जंघाएँ और ऊरु (जाँघें) बनीं, तथा पृथ्वी के तेज से **नितम्ब** (कुल्हा) बना। (15) ब्रह्मा के तेज से **पैर** बने, और उनकी अंगुलियाँ सूर्य के तेज से बनीं। आठ वसुओं के तेज से **हाथों की अँगुलियाँ** बनीं, और कुबेर के तेज से **नासिका** बनी। (16)

तस्यास्तु दन्ता: सम्भूता: प्राजापत्येन तेजसा ।
नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा ॥१७॥
भ्रुवौ च संध्ययोस्तेज: श्रवणावनिलस्य च ।
अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा ॥१८॥

**हिंदी अर्थ:** उस देवी के **दाँत** प्रजापति (दक्ष) के तेज से उत्पन्न हुए। अग्नि (पावक) के तेज से **तीन नेत्र** बने। (17) दोनों भौंहें संध्या के तेज से, और कान वायु (अनिल) के तेज से बने। अन्य देवताओं के तेज से भी शुभ (शिवा) देवी का प्राकट्य हुआ। (18)

तत: समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्‌भवाम् ।
तां विलोक्य मुदं प्रापुरमरा महिषार्दिता: ॥१९॥
शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक् ।
चक्रं च दत्तवान् कृष्ण: समुत्पाद्य स्वचक्रत: ॥२०॥

**हिंदी अर्थ:** तब महिषासुर द्वारा पीड़ित देवताओं ने समस्त देवों के तेज के पुंज से उत्पन्न हुई उस देवी को देखकर परम प्रसन्नता प्राप्त की। (19) शिव (पिनाकधृक्) ने अपने शूल (त्रिशूल) में से शूल निकालकर देवी को दिया। कृष्ण (विष्णु) ने अपने चक्र में से चक्र उत्पन्न करके उन्हें दिया। (20)

शङ्‌खं च वरुण: शक्तिं ददौ तस्यै हुताशन: ।
मारुतो दत्तवांश्‍चापं बाणपूर्णे तथेषुधी ॥२१॥
वज्रमिन्द्र: समुत्पाद्य कुलिशादमराधिप: ।
ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद् गजात् ॥२२॥

**हिंदी अर्थ:** वरुण ने शंख दिया, और अग्नि (हुताशन) ने शक्ति दी। (21) वायु (मारुत) ने धनुष और बाणों से भरे दो तरकश (इषुधी) दिए। देवताओं के राजा सहस्राक्ष (इंद्र) ने अपने वज्र से वज्र उत्पन्न करके देवी को दिया, और ऐरावत हाथी से घंटा निकालकर दिया। (22)

कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ ।
प्रजापतिश्‍चाक्षमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम् ॥२३॥
समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकर: ।
कालश्‍च दत्तवान् खड्‌गं तस्याश्‍चर्म च निर्मलम् ॥२४॥

**हिंदी अर्थ:** यम ने अपने कालदण्ड में से दण्ड (छड़ी) दिया, और वरुण (अम्बुपति) ने पाश (फंदा) दिया। (23) ब्रह्मा (प्रजापति) ने अक्षमाला (माला) दी, और कमंडलु भी दिया। सूर्य (दिवाकर) ने अपने सभी किरणें देवी के रोमकूपों में भर दीं। काल (समय) ने उन्हें खड्ग (तलवार) और स्वच्छ ढाल (चर्म) दी। (24)

क्षीरोदश्‍चामलं हारमजरे च तथाम्बरे ।
चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च ॥२५॥
अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु ।
नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम् ॥२६॥

**हिंदी अर्थ:** क्षीरसागर (क्षीरोद) ने उन्हें स्वच्छ हार और कभी मैले न होने वाले दो वस्त्र (अम्बर) दिए। (25) साथ ही दिव्य चूडामणि, दो कुंडल और कंगन (कटकानि) भी दिए। तथा सभी भुजाओं पर धारण करने के लिए सुंदर अर्धचंद्र और बाजूबंद (केयूर) दिए। (26)

अङ्‌गुलीयकरत्‍नानि समस्तास्वङगुलीषु च ।
विश्‍वकर्मा ददौ तस्यै परशुं चातिनिर्मलम् ॥२७॥
अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम् ।
अम्लानपङकजां मालां शिरस्युरसि चापराम् ॥२८॥

**हिंदी अर्थ:** सभी अंगुलियों में पहनने के लिए रत्नजड़ित अंगूठियाँ (अंगुलीयकरत्नानि) भी दीं। विश्वकर्मा ने उन्हें परशु (फरसा) और अत्यंत स्वच्छ (अन्य) अस्त्र-शस्त्र दिए। (27) उन्हें अनेक प्रकार के अस्त्र, और कभी न टूटने वाला कवच (दंशनम्) भी दिया। क्षीरसागर ने सिर पर और छाती पर पहनने के लिए न मुरझाने वाले कमलों की मालाएँ भी दीं। (28)

अददज्जलधिस्तस्यै पङ्‌कजं चातिशोभनम् ।
हिमवा‍न् वाहनं सिंहं रत्‍नानि विविधानि च ॥२९॥
ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिप: ।
शेषश्‍च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम् ॥३०॥
नागहारं ददौ तस्यै धत्ते य: पृथिवीमिमाम् ॥
अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा ॥३१॥

**हिंदी अर्थ:** समुद्र (जलधि) ने उन्हें कमल का एक अति सुंदर पुष्प भी दिया। हिमालय (हिमवान्) ने उन्हें सवारी के लिए **सिंह** और विभिन्न रत्न दिए। (29) धनाधिप कुबेर ने कभी खाली न होने वाला मदिरा से भरा पानपात्र दिया। (30) और सभी नागों के स्वामी शेषनाग ने, जो पृथ्वी को धारण करते हैं, महामणियुक्त नागहार उन्हें दिया। (31) अन्य देवताओं ने भी देवी को बहुत से आभूषण और आयुध दिए।

सम्मानिता ननादोच्चै: साट्टहासं मुहुर्मुहु: ।
तस्या नादेन घोरेण कृत्स्नमापूरितं नभ: ॥३२॥
अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत् ।
चुक्षुभु: सकला लोका: समुद्राश्र्च चकम्पिरे ॥३३॥

**हिंदी अर्थ:** इस प्रकार सम्मानित होने पर देवी ने बार-बार **अट्टहास** करके उच्च स्वर में गर्जना की। (32) उनकी उस भयंकर गर्जना से सम्पूर्ण आकाश भर गया। उसके अत्यंत महान प्रतिध्वनि (गूँज) से सभी लोक क्षुब्ध हो गए और समुद्र काँप उठे। (33)

चचाल वसुधा चेलु: सकलाश्‍च महीधरा: ।
जयेति देवाश्‍च मुदा तामूचु: सिंहवाहिनीम् ॥३४॥
तुष्टुवुर्मुनयश्‍चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तय: ।
दृष्ट्‌वा समस्तं संक्षुब्धं त्रैलोक्यममरारय: ॥३५॥

**हिंदी अर्थ:** पृथ्वी हिल गई और सभी पर्वत डोल उठे। देवताओं ने प्रसन्नता से सिंहवाहिनी देवी से "जय हो" कहा, (34) और मुनियों ने भक्ति से विनम्र होकर उनकी स्तुति की। जब अमर (देवताओं) के शत्रुओं (असुरों) ने तीनों लोकों को इस प्रकार क्षुब्ध देखा, (35)

संनद्धाखिलसैन्यास्ते समुत्तस्थुरुदायुधा: ।
आ: किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुर: ॥३६॥
अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृत: ।
स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा ॥३७॥

**हिंदी अर्थ:** तब वे सारे सैनिक तैयार होकर, हाथ में आयुध लेकर खड़े हो गए। (36) "अरे! यह क्या है?" ऐसा क्रोध से कहकर महिषासुर सभी असुरों से घिरा हुआ उस शब्द की ओर दौड़ा। (37) तब उसने उस देवी को देखा, जो अपनी कांति से तीनों लोकों को व्याप्त किए हुए थी।

पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम् ।
क्षोभिताशेषपातालां धनुर्ज्यानि:स्वनेन ताम् ॥३८॥
दिशो भुजसहस्त्रेण समन्ताद् व्याप्य संस्थिताम् ।
तत: प्रववृते युद्धं तया देव्या सुरद्विषाम् ॥३९॥

**हिंदी अर्थ:** (उस देवी को) जिसके पैरों के भार से पृथ्वी झुकी जा रही थी, जिसका किरीट आकाश को छू रहा था। (38) धनुष की प्रत्यंचा (दोरी) के टंकार से जिसने सभी पातालों को भी क्षुब्ध कर दिया था, और जो अपनी हजारों भुजाओं से सभी दिशाओं में व्याप्त होकर खड़ी थी। तब उस देवी के साथ असुरों का युद्ध शुरू हुआ। (39)

शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्‍तैरादीपितदिगन्तरम् ।
मिहिषासुरसेनानीश्‍चिक्षुराख्यो महासुर: ॥४०॥
ययुधे चामरश्‍चान्यैश्‍चतुरङ्‌गबलान्वित: ।
रथानामयुतै: षड्‌भिरुदग्राख्यो महासुर: ॥४१॥
अयुध्यतायुतानां च सहस्त्रेण महाहनु: ।

**हिंदी अर्थ:** अनेक प्रकार से छोड़े गए अस्त्रों और शस्त्रों से सभी दिशाएँ प्रज्वलित हो उठीं। महिषासुर का सेनापति **चिक्षुर** नामक महाअसुर (40) तथा **चामर** (नामक) अन्य असुर चतुरंगिणी सेना के साथ युद्ध करने लगा। (41) **उदग्र** नामक महाअसुर छः हजार रथों के साथ युद्ध कर रहा था। **महाहनु** नामक असुर दस हजार रथों के साथ युद्ध कर रहा था।

पंचाशद्‌भिश्‍च नियुतैरसिलोमा महासुर: ॥४२॥
अयुतानां शतै; षड्‌भिर्बाष्कलो युयुधे रणे ।
गजवाजिसहस्रौघैरनेकै: परिवारित: ॥४३॥
वृतो रथानां कोट्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत ।
बिडालाख्योऽयुतानां च पञ्चाशद्भिरथायुतै: ॥४४॥

**हिंदी अर्थ:** पचास लाख (नियुत) असुरों के साथ **असिलोमा** नामक महाअसुर (42) और छः लाख (अयुतानां शतै: षड्‌भिर्) रथों के साथ **बाष्कळ** नामक असुर युद्ध में लड़ रहा था। (43) तथा अनेक हजार हाथी और घोड़ों के झुंड से घिरा हुआ, और एक करोड़ (कोटि) रथों से घिरा हुआ (44) **बिडाल** नामक असुर पचास हजार रथों के साथ युद्ध में लड़ रहा था।

युयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारित: ।
अन्ये च तत्रायुतशो रथनाहगयैर्वृता: ॥४५॥
युयुधु: संयुगे देव्या सह तत्र महासुरा:
कोटिकोटिसहस्त्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा ॥४६॥
हयानां च वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुर: ।

**हिंदी अर्थ:** वहाँ युद्ध में अन्य भी हजारों (अयुतशो) महाअसुर, रथ, हाथी और घोड़ों से घिरे हुए, उस देवी के साथ युद्ध करने लगे। (45) और स्वयं महिषासुर, करोड़ों (कोटि-कोटि सहस्रै:) रथों, हाथियों (दन्तिनां) और घोड़ों से घिरा हुआ, युद्ध में लड़ रहा था। (46)

तोमरैर्भिन्दिपालैश्‍च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा ॥४७॥
युयुधु: संयुगे देव्या खड्‌गै: परशुपट्टिशै: ।
केचिच्च चिक्षिपु: शक्ती: केचित्पाशांस्तथापरे ॥४८॥
देवीं खड्‍गप्हारैस्तु ते तां हन्तुं प्रचक्रमु: ।
सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका ॥४९॥

**हिंदी अर्थ:** असुरों ने तोमर, भिन्दिपाल, शक्ति (हथियार), मूसल, (47) खड्ग, फरसा और पट्टिश (धारदार हथियार) से देवी के साथ युद्ध किया। कुछ असुरों ने शक्ति फेंकी, कुछ ने पाश (फंदे) फेंके। (48) और कुछ असुर तलवारों के प्रहार से देवी को मारने के लिए आगे बढ़े। तब चंडिका देवी ने उन सभी शस्त्रों और अस्त्रों को (49)

लीलयैव प्रचिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी ।
अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरर्षिभि: ॥५०॥
मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणी चेश्‍वरी ।
सोऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेशरी ॥५१॥

**हिंदी अर्थ:** अपनी अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा से खेल-खेल में ही काट डाला। (50) देवताओं और ऋषियों द्वारा स्तुति की जाती हुई उस देवी (ईश्वरी) ने बिना थके (अनायस्तानना) असुरों के शरीरों पर अपने शस्त्र और अस्त्र चलाए। (51) और क्रोधित होकर, अपनी गर्दन के बाल (सटा) हिलाता हुआ देवी का वाहन सिंह (केशरी) भी (52)

चचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशन: ।
नि:श्‍वासान् मुमुचे यांश्र्च युध्यमाना रणेऽम्बिका ॥५२॥
त एव सद्य: सम्भूता गणा: शतसहस्रश: ।
युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशै: ॥५३॥

**हिंदी अर्थ:** वनों में अग्नि की तरह असुरों की सेना में घूमने लगा। युद्ध में लड़ती हुई अंबिका देवी ने जो श्वास (नि:श्वास) छोड़े, (53) वे ही तुरंत सैकड़ों-हजारों गणों (अनुचरों) के रूप में उत्पन्न हो गए। वे (गण) देवी की शक्ति से बल पाकर (54)

नाशयन्तोऽसुरगणान् देवीशक्‍त्युपबृंहिता: ।
अवादयन्त पटहान् गणा: शङ्‌खांस्तथापरे ॥५४॥
मृदङ्‌गांश्‍च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे ।
ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्‍तिवृष्टिभि: ॥५५॥

**हिंदी अर्थ:** फरसा, भिन्दिपाल, तलवार और पट्टिश से असुरों के समूहों का नाश करते हुए युद्ध करने लगे। कुछ गण नगाड़े (पटहान्) बजा रहे थे, कुछ शंख, (55) और कुछ अन्य मृदंग (ढोलक) बजा रहे थे, जैसे वह युद्ध न होकर कोई महान उत्सव हो। तब देवी ने त्रिशूल से, गदा से, शक्ति की वर्षा से, (56)

खड्‌गादिभिश्‍च शतशो निजघान महासुरान् ।
पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान् ॥५६॥
असुरान् भुवि पाशेन बद्‌ध्वा चान्यानकर्षयत् ।
केचिद् द्विधा कृतास्तीक्ष्णै: खड्‌गपातैस्तथापरे ॥५७॥
विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते ।

**हिंदी अर्थ:** और सैकड़ों तलवारों आदि से महाअसुरों का संहार किया। (57) अन्य असुरों को अपनी घंटा (घंटी) की आवाज़ से मोहित करके पृथ्वी पर गिरा दिया, (58) कुछ असुरों को पाश (फंदे) से बाँधकर खींच लिया। कुछ असुरों को तीक्ष्ण तलवारों के प्रहार से दो टुकड़ों में काट दिया, और कुछ को (59)

वेमुश्‍च केचिद्रुधिरं मुसलेन भृशं हता: ॥५८॥
केचिन्निपतिता भूमौ भिन्ना: शूलेन वक्षसि ।
निरन्तरा: शरौघेण कृता: केचिद्रणाजिरे ॥५९॥
श्येनानुकारिण: प्राणान् मुमुचिस्त्रिदशार्दना: ।
केषांचिद् बाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे ॥६०॥

**हिंदी अर्थ:** गदा के प्रहार से धराशायी होकर पृथ्वी पर सो गए। (60) मूसल से बुरी तरह मारे गए कुछ असुर खून की उल्टी करने लगे। कुछ के वक्षस्थल (छाती) में शूल (त्रिशूल) लगने से वे पृथ्वी पर गिर गए। कुछ असुरों के शरीर रणभूमि में बाणों की वर्षा से (61)

शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिता: ।
विच्छिन्नजङ्‌घांस्त्वपरे पेतुरुर्व्यां महासुरा: ॥६१॥
एकबाह्‌वक्षिचरणा: केचिद्देव्या द्विधा कृता: ।
छिन्नेऽपि चान्ये शिरसि पतिता: पुनरुत्थिता: ॥६२॥

**हिंदी अर्थ:** पूरी तरह से भर गए। देवताओं को पीड़ा देने वाले वे असुर बाज (श्येन) की तरह प्राण त्यागने लगे। कुछ की भुजाएँ कट गयीं, कुछ की गर्दनें कट गयीं। (62) कुछ के सिर कटकर गिर पड़े, और कुछ बीच में से फट गए। कुछ महाअसुर कटी हुई जाँघों के साथ पृथ्वी पर गिर पड़े। (63)

कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधा: ।
ननृतुश्‍चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिता: ॥६३॥
कबन्धाश्छिन्नशिरस: खड्‌गशक्त्यृष्टिपाणय: ।
तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुरा: ॥६४॥

**हिंदी अर्थ:** कुछ असुरों को देवी ने एक बांह, एक आँख और एक पैर वाले होने पर भी दो टुकड़ों में काट दिया। (64) कुछ असुरों के सिर कटने के बाद भी वे फिर से खड़े हो गए और उत्तम आयुध लेकर देवी के साथ युद्ध करने लगे। (65) सिर कटे हुए (कबन्धा) कुछ असुर, वाद्य यंत्रों की ध्वनि पर तालबद्ध होकर युद्ध में नाचने लगे। (66)

पातितै रथनागाश्‍वैरसुरैश्‍च वसुन्धरा ।
अगम्या साभवत्तत्र यत्राभूत्स महारण: ॥६५॥
शोणितौघा महानद्य: सद्यस्तत्र प्रसुस्रुवु: ।
मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम् ॥६६॥

**हिंदी अर्थ:** हाथ में तलवार, शक्ति और भाला लिए हुए सिर कटे हुए वे धड़ (कबन्धा) और अन्य महाअसुर "ठहर! ठहर!" ऐसा बोलते हुए देवी पर टूट पड़े। (67) रथ, हाथी, घोड़े और गिरे हुए असुरों के कारण वह रणभूमि (जहाँ वह महासंग्राम हो रहा था) अगम्य हो गई थी। (68)

क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका ।
निन्ये क्षयं यथा वह्‌निस्तृणदारुमहाचयम् ॥६७॥
स च सिंहो महानादमुत्सृजन्धुतकेशर: ।
शरीरेभ्योऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति ॥६८॥

**हिंदी अर्थ:** असुरों की सेना, हाथी और घोड़ों के बीच तुरंत खून की महानदियाँ बहने लगीं। (69) अंबिका देवी ने क्षण भर में असुरों की उस विशाल सेना को उसी प्रकार नष्ट कर दिया, जिस प्रकार अग्नि घास और लकड़ी के बड़े ढेर को भस्म कर देती है। (70)

देव्या गणैश्‍च तैस्तत्र कृतं युद्धं महासुरै: ।
यथैषां तुतुषुर्देवा: पुष्पवृष्टिमुचो दिवि ॥ॐ॥६९॥

**हिंदी अर्थ:** और वह सिंह भी अपनी गर्दन के बाल हिलाता हुआ, महान गर्जना करते हुए, देवताओं के शत्रुओं (असुरों) के शरीरों से उनके प्राणों को चुन-चुन कर निकाल रहा था। (71) देवी के गणों ने भी वहाँ महाअसुरों के साथ ऐसा घोर युद्ध किया, जिससे प्रसन्न होकर देवताओं ने आकाश से फूलों की वर्षा की। (72)

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये
महिषासुरसैन्यवधो नाम द्वितीयोऽध्याय: ॥२॥

उवाच १

श्‍लोका: ६८

एवम् ६९

एवमादित: १७३ ॥

श्री चंडिका विजयते

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